Header Ads

Header ADS

स्काईग्लो: प्रकाश प्रदूषण क्या है ?

 

प्रकाश प्रदूषण क्या है ? हमारे लिए कैसे खतरनाक है प्रकाश प्रदूषण 

चर्चा में क्यों?

हाल के एक अध्ययन से पता चला है कि बीटल जैसे कीट जो अपने कम्पास के रूप में आकाशगंगा की प्राकृतिक चमक पर निर्भर थे, स्काईग्लो (प्रकाश प्रदूषण के परिणामस्वरूप किसी क्षेत्र में रात के दौरान आकाश में चमक) के कारण पृथ्वी की कृत्रिम रोशनी पर निर्भर हैं।

प्रकाश प्रदूषण क्या है ?

प्रकाश का प्रदूषण रात के समय आसमान पर दिखने वाली चमक-दमक को कहते हैं। प्रकाश का प्रदूषण हमारे घरों में दरवाजों और खिड़कियों के जरिये बाहर सड़कों पर लगे हुए बिजली के खम्भों और लैम्पों से भी घुस आता है। जो मौजूदा जिन्दगी में अनिवार्य और जरूरी चीज बन जाता है। इस तरह का प्रदूषण पर्यावरण में प्रकाश की वजह से लगातार बढ़ रहा है। इसको रोकने या कम करने का तरीका यही है कि बिजली या रोशनी का उपयोग जरूरत पड़ने पर ही किया जाये। प्रकाश का प्रदूषण तीन तरह से फैलता है -

1. आसमान की चमक-दमक लालिमा से।
2. घरों के अन्दर और बाहर से आने वाला प्रकाश। चौंधिया देने वाला तेज प्रकाश।
3. लगातार निकलने वाली आसमान की चमक-दमक या लालिमा।

प्रमुख बिंदु

स्काईग्लो के बारे में:

  • स्काईग्लो शहरों में और उनके आस-पास रात के समय आकाश में प्रकाश की एक सर्वव्यापी चादर है जो सबसे चमकीले सितारों को छोड़कर सभी को अवरुद्ध कर सकती है।
  • रात के समय रिहायशी इलाकों में आसमान का चमकना स्ट्रीट लाइट, सुरक्षित फ्लडलाइट और बाहरी सजावटी रोशनी स्काईग्लो का कारण बनता है।
  • यह प्रकाश सीधे रात्रिचर (रात में सक्रिय जीव) की आँखों में जाता है तथा उन्हें मार्ग से भटकाने का कार्य करता है।
  • स्काईग्लो' प्रकाश प्रदूषण के घटकों में से एक है।

प्रकाश प्रदूषण:

  • प्रकाश प्रदूषण के बारे में:
    • कृत्रिम प्रकाश का अनुचित या अत्यधिक उपयोग- जिसे प्रकाश प्रदूषण (Light Pollution- LP) के रूप में जाना जाता है, के मानव, वन्य जीवन और जलवायु के लिये गंभीर पर्यावरणीय परिणाम हो सकते हैं।
    • प्रकाश प्रदूषण के घटकों में शामिल हैं:
      • चकाचौंध (Glare): अत्यधिक चमक जो दृश्यता में अवरोध का कारण बनती है।
      • स्काईग्लो (Skyglow): रिहायशी इलाकों में रात में आसमान का चमकना।
      • प्रकाश अतिचार (Light Trespass): प्रकाश का उस स्थान पर गिरना जहांँ इसकी आवश्यकता नहीं हो।
      • अव्यवस्थित (Clutter): प्रकाश स्रोतों का चमकीला, भ्रमित और अत्यधिक समूह।
  • कारण:
    • LP औद्योगीकरण का एक साइड इफेक्ट है।
    • इसके स्रोतों में इमारतों की बाहरी और आंतरिक प्रकाश व्यवस्था, विज्ञापन, वाणिज्यिक संपत्तियों, कार्यालयों, कारखानों, स्ट्रीटलाइट्स तथा खेल स्थलों का निर्माण शामिल है।
  • रोशनी का प्रदूषण वातावरण पर किस तरह और क्या असर डालता है


    यह एक हकीकत है कि तेज रोशनी जो घर के अन्दर या बाहर से घुस आती हो, हर हाल में कुछ अरसा के बाद अपना असर दिखाती है। बरसों के अन्वेषण से पता चला है कि घरों के अन्दर फ्लोरेसन्ट ट्यूब और तेज रोशनी से माइग्रेन, सिर दर्द, थकावट, चिड़चिड़ाहट जैसी शिकायत पैदा हो जाती है। घर के बाहर सड़कों पर पब्लिक इमारतों में रात के वक्त दुर्घटनाओं को रोकने के लिये खूब तेज रोशनी का इस्तेमाल किया जाता है। जिससे पर्यावरण में प्रदूषण बढ़ जाता है।

    अनुभव और खोज से पता चला है कि ऐसी रोशनी से अपराध में कोई खास कमी तो नहीं आई अलबत्ता हर साल सिर्फ एक लाइट पर कई टन कोयला खर्च हो जाता है। अगर आप रात के वक्त आसमान की चमक-दमक की तरफ नजर करें तो आप को उसमें मध्यम रोशनी की धुन्ध भी दिखाई देगी। यही रोशनी के प्रदूषण का सबूत है। इस मसले पर सालों से खोज व अध्ययन का काम जारी है और रात के वक्त शहरों और देहातों के साफ आसमान की अलग-अलग तस्वीरें खींची जाती हैं जिसमें मालूम होता है कि रात के वक्त रोशनी से कैसा प्रदूषण माहौल में घुल रहा है और यह बहुत ही खतरनाक समस्या है। इस तरह स्थाई तेज रोशनी के इन्तजाम से फसलों, दरख्तों और जानवरों को जबरदस्त नुकसान हो सकता है। पौधों को बढ़ने और जिन्दा रहने के लिये अंधेरा और रोशनी दोनों ही की जरूरत पड़ती है अंधेरा बीज को फूल में बदलने और पौधे को जिन्दगी देने में मदद देता है। रात के वक्त रोशनी की ज्यादती से घबराकर चिड़िया खिड़कियों, मीनारों और वीरान इमारतों की तरफ उड़कर जाने की कोशिश करती हैं।

    रोशनी का दुष्प्रभाव मेढकों और रात के वक्त जागने वाले कीड़े-मकोड़ों की प्रजनन क्षमता पर भी पड़ता है। इन्सानी आँख को कुदरत ने इतनी ताकत दी है कि वह मानसूनी रोशनी और उसके दबाव को बर्दाश्त कर लेती है, मगर तेज और चौंधिया देने वाली रोशनी और उसकी ज्यादती उसको नुकसान पहुँचाती है। इससे देखने की क्षमता प्रभावित होती है। यह ऐसा खतरा है जो आने वाली नस्लों को और ज्यादा परेशान और प्रभावित करेगा। कुदरत ने जो साफ-स्वच्छ वातावरण मानव जीवन को कायम रखने के लिये बनाया है हमें उसकी हर कीमत पर हिफाजत करना चाहिए यह हमारा फर्ज है कि इस महत्त्वपूर्ण मुद्दे को हल करने का प्रयास करें।

    एक जानी मानी सामाजिक कार्यकर्ता ने लिखा है कि इस महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं है। इसके सम्बन्धी जरूरी जानकारी और उपाय बताने के लिये उन्होंने एक वेबसाइट बनाई है, जिससे लोग फायदा उठा सकते हैं। और यह जान सकते हैं कि रोशनी के प्रदूषण को कैसे काम किया जा सकता है।

    तेज रोशनी एक कष्टदायक चीज है। रात के वक्त सुरक्षा और माहौल को ठीक रखने के लिये यह जरूरी भी है। रोशनी के प्रदूषण को आसानी से कम किया जा सकता है-

    1. रोशनी (बिजली) की फिटिंग इस तरह की जाय कि उससे निकलने वाली रोशनी कम मात्रा में ऊपर की तरफ जाये।
    2. बल्ब, ट्यूब वगैरह उचित जगहों पर फासलों पर नीचे की तरफ झुकाकर लगाये जायें।
    3. रोशनी का इस्तेमाल कम-से-कम किया जाये।
    4. गैर जरूरी रोशनी को बुझा दिया जाये। खासकर सजावट करने वाली रोशनी और इश्तेहारों के पोस्टरों और खेमों में देखा जाता है कि रात भर बल्ब जलते रहते हैं। यह गलत तरीका है। सुबह होने पर रोशनियों को गुल कर देना चाहिए।

    खुशी की बात है कि रोशनी प्रदूषण के खिलाफ बहुत सी संस्थाएं हरकत में आ गई हैं। खासकर आसमान पर रोशनी के प्रदूषण के खिलाफ उनका कहना है कि आसमान पर ज्यादा अंधेरा रहना चाहिये। शहरी महकमों, लोकल सेल्फ कौंसिल और कॉर्पोरेशन रोशनी के डिजाइन बनाने वाले इंजीनियरों को इस बात का एहसास हो रहा है कि रोशनी के प्रदूषण को कम करने की जरूरत है।
  • ऊर्जा और धन की बर्बादी:
      • जब प्रकाश बहुत अधिक मात्रा में उत्सर्जित होता है या जब और जहांँ इसकी आवश्यकता नहीं होती है, उन स्थानों पर इसकी चमक बेकार है। ऊर्जा की बर्बादी में के भारी आर्थिक व पर्यावरणीय परिणाम होते हैं।
    • पारिस्थितिकी तंत्र और वन्य जीवन को बाधित करना:
      • प्रजनन, पोषण, नींद और शिकारियों से सुरक्षा जैसे जीवन-निर्वाह व्यवहारों को नियंत्रित करने हेतु पौधे व जानवर पृथ्वी पर दिन एवं रात के प्रकाश दैनिक चक्र पर निर्भर करते हैं।
      • वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि रात में कृत्रिम प्रकाश उभयचरों, पक्षियों, स्तनधारियों, कीड़ों और पौधों सहित कई जीवों पर नकारात्मक एवं घातक प्रभाव डालता है।
        • उदाहरण: एक अध्ययन से पता चला है कि कैसे रात्रिचर गोबर भृंग (Dung Beetles) रात्रिकालीन प्राकृतिक प्रकाश से मार्गनिर्देश न प्राप्त कर पाने की स्थिति में अपने आस-पास के वातावरण में संकेतों की खोज करने के लिये मजबूर होते हैं।
    • मानव स्वास्थ्य को नुकसान:
      • पृथ्वी पर अधिकांश जीवों की तरह मनुष्य एक सर्कैडियन विधि का पालन करते हैं जिसे हम जैविक घड़ी या दिन-रात चक्र द्वारा शासित नींद-जागने के एक पैटर्न के रूप में उपयोग करते हैं। रात में कृत्रिम प्रकाश उस चक्र को बाधित कर सकता है।

समाधान:

  • जानवरों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रकाश प्रदूषण के अनुभव को कम करने के लिये एक उल्लेखनीय सरल उपाय है: रात में अनावश्यक प्रकाश बंद कर दें।
  • जहाँ रोशनी को बंद नहीं किया जा सकता है, उन्हें संरक्षित किया जा सकता है ताकि वे आसपास के वातावरण और आकाश में प्रकाश का उत्सर्जन न करें।
  • इंटरनेशनल डार्क-स्काईज़ एसोसिएशन ने 130 से अधिक 'इंटरनेशनल डार्क स्काई प्लेसेस' को प्रमाणित किया है, जहाँ कृत्रिम प्रकाश व्यवस्था को स्काईग्लो और प्रकाश अतिचार को कम करने के लिये समायोजित किया गया है। हालाँकि लगभग सभी उत्तरी गोलार्ध में स्थित विकसित देशों में पाए जाते हैं।
  • कम विकसित क्षेत्र अक्सर दोनों प्रजातियों के लिये समृद्ध होते हैं और वर्तमान में जहाँ के प्रकाश कम प्रदूषणकारी होते हैं, जिससे जानवरों को गंभीर रूप से प्रभावित होने से पूर्व प्रकाश जैसी समस्याओं के समाधान में निवेश करने का अवसर मिलता है।

सोर्स :- down to earth 

No comments

Powered by Blogger.